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अम्बेडकर वाद और उसके विरोधी

किसी को पसंद नापसंद करना उस व्यक्ति का निजी चुनाव हो सकता है मगर नापसंदगी को द्वेष कहना सही नहीं है ।

कोई भी व्यक्ति आलोचना से परे नहीं हो सकता जब लोगों ने गांधी , चर्चिल , स्टॅलिन ,माओ , मार्क्स , रूजवेल्ट और लिंकन जैसे महान नेताओ को पसंद नहीं किया और उनके फैसलो कि आलोचना की तब जाहिर है डॉ अंबेडकर के काम भी कुछ लोगों को पसंद आए और कुछ को नहीं।

हालांकि डॉ अम्बेडकर विश्व नेता से अधिक समाज सुधारक थे । भारतीय जन मानस उनका ता उम्र ऋणी रहेगा कि उन्होंने बंटवारे के वक्त जिन्ना का साथ नहीं दिया और गांधी नेहरू से पुराने मतभेद भुला कर देश और दलित समाज के व्यापक हित को वरीयता देते हुए भारत को चुना अन्यथा उन्ही की तरह एक बंगाली दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल ने तो पाकिस्तान का चुनाव किया । और उधर दलितों के साथ क्या सुलूक हुआ यह दुनिया जानती है मंडल को बेआबरू हो कर भारत लौटना पड़ा और बाकी जीवन उनने गुमनामी में बिताया ।

डॉ अंबेडकर संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्य्क्ष थे जिसका अर्थ है कि उनकी देख रेख में संविधान का ड्राफ्ट तैयार हुआ और डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने उसे मान्यता दी।

यहां यह बात दीगर है कि अम्बेडकर साहब का अपने समय के कुछ नेताओं के साथ विभिन्न मसलों पर मतभेद रहा किन्तु मनभेद नहीं । मगर यह भी सच है कि नेहरू जी ने उनको चुनाव हरवाया था । परन्तु चुनाव होते हैं तो जाहिर है कि कोई जीतता है और कोई हारता है।

उन दिनों नेहरू जी की वह लोकप्रियता थी जो आज मोदी जी की है , और अम्बेडकर जी ने कुछ मसलों पर उनसे विरोध जताया था ।

एक मसला महाराष्ट्र राज्य की स्थापना को ले कर था । नेहरू जी , मुरार जी देसाई और अन्य कांग्रेस नेता भाषाई आधार पर नए राज्यों को बनता देखना नहीं चाहते थे । इसलिए महाराष्ट्र राज्य की मांग करने वालों का उन्होंने दमन किया । हाल इस कदर बिगड़ गए थे कि भारत सरकार के वित्त मंत्री सी डी देशमुख जो भारतीय रिजर्व बैंक के पहले भारतीय गवर्नर भी किसी समय थे उन्होंने नेहरू जी की महाराष्ट्र विरोधी नीतियों को ले कर पद से इस्तीफा दिया था सन १९५६ में , अम्बेडकर जी ने उनका समर्थन किया था हालांकि उसी साल दिसंबर में अम्बेडकर जी चल बसे।

अंबेडकर जी के विरोधी उनको रिज़र्वेशन या आरक्षण लाने का दोष देते हैं मगर उन्होंने यह वयवस्था अधिक से अधिक १० साल तक ही रखने की सिफारिश की थी , यह तो बाद कि सरकार थीं जिन्होंने दलित वोट बैंक पर कब्ज़ा जमाने यह व्यवस्था अब तक जारी रखी है ।

पुतला जलाना प्रदर्शन करना दिल की भड़ास निकालने का जरिया है बस । लोग बाग तो गांधी , नेहरू और प्रधानमंत्री तक का पुतला विरोध प्रदर्शन में जलाते हैं , क्या वह महानता में डॉ अंबेडकर से कहीं कम है ? मगर फिर भी उनका विरोध हुआ ।

मुझे ऐसा लगता है कि डॉ अंबेडकर से अधिक लोग उनके अनुयायियों की हरकतों से नाराज होते हैं ।

आज की तारीख में डॉ अम्बेडकर के नाम पर कई पोलिटिकल पार्टियां और फ्रिंज ग्रुप चल रहे हैं जिनका काम है

१. हिन्दू देवी देवताओं पर भद्दी टिप्पणी करना ।

२. हिन्दू धर्म स्थलों को बौद्ध बताना।

३. हिन्दू धर्म की मान्यताओं को अंधविश्वास का नाम देना ।

४. मनु स्मृति जलाना ।

५. तिलक तराजू तलवार को जूते लगाने की बात करना ।

यह कुछ ऐसे काम हैं जिसकी वजह से लोग डॉ आंबेडकर की राजनैतिक विरासत चलाने वालों से नाराज़ होते हैं ।

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