मध्यम वर्ग के नैतिक मूल्य उँचे होते हैं , लड़ाई झगड़े मार पीट से कोसो दूर होता है क्योंकि उसे अपनी और परिवार की इज़्ज़त प्यारी होती है फिर चाहे वह जिस भी धर्म मज़हब और पंथ का हो |
इस मध्यम वर्ग हेतु कांग्रेस भाजपा और अलानी फलानी पार्टी के किसी भी नेता ने कभी भी गंभीरता पूर्वक विचार नहीं किया | सरकारी योजनाएँ या तो धन पशुओं के हितों में बनतीं हैं या कथित ग़रीबी की रेखा से नीचे रहने वाले मजदूर किसानों के |
मध्यम वर्ग के साथ सदैव सौतेला व्यवहार किया जाता है और रहेगा | जो केबल ओपरेटरस , मीडिया शनेल और संस्थान लॉक डाउन के दौरान भी पुराने कार्यक्रम दिखा कर ‘पूरी पूरी’ कीमत वसूलते हैं वह
१. कोरोना से हुई मौतों को दिखा दिखा कर नकारात्मकता फैलाते हैं|
२. लॉक डाउन तोड़ते लोगों की तस्वरे दिखाते हैं |
३. पैदल चलते मजदूरों को दिखाते हैं रोक कर इंटेरव्यु लेते हैं |
४. यात्रा के दौरान रास्ते में ढहते मजदूरों की तस्वीरे दिखा कर |
५. सूटकेस पर सोते ब्च्हचों की तस्वीरें दिखा कर|
६. गाड़ियों और ट्रेनों से कुचले जाते मजदूरों की तस्वीरें दिखला कर |
७. अकेले मजदूरों और ग़रीबों की ही हालात दिखा दिखा कर |
तमाम लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लॅकमेल कर , सरकार और व्यवस्था के खिलाफ माहौल बना कर , अपना उल्लू सीधा करते हैं !
कई चॅनेल्स ने तो अब अपने दर्शकों से ( जो अधिकतर मध्य वर्ग के ही होते हैं ) चंदा माँगना शुरू कर दिया है कोरोना फंड के नाम पर |
इसी तरह धन पशुओं की कंपनियाँ और विदेशी कंपनियाँ कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी के तहत कोरोना फंड स्थापित किए हैं जिनके बदौलत चंदा एंप्लायी दें ( जो अधिकतर मध्य वर्ग के हैं ) और वह चंदा यह लोग सीएसआर प्रोग्राम के तहत सरकार को दें , जिससे इनकी इमेज चमक गयी , बोर्ड और कपनियों के मालिकान की जेब से एक आंटा खर्च न हुआ , एक इवेंट करा कर कंपनियों का सीईओ अथवा डाइरेक्टर किसी मंत्री क्लेक्टर के साथ फोटो खींचा लेगा , नये सरकारी ठेके लेगा , तो साहब इस तरह से हींग लगेगी न फिटकरी रंग चोखा आएगा !
कई कई कंपनियों ने तो एंप्लायी को निकालना शुरू किया है काम से ! एमपलोई की सहमति के बगैर उनकी सॅलरी काटना शुरू किया , या अगर सॅलरी सीधे रूप से न काटी तो , हज़ार दो हज़ार रुपये सलारी से कंपनी के कोरोना फंड में काट लिए गये !
कंपनियाँ जो अपने एमपलोई का बीमा कराती है अप्रैल तक अनेक बीमा कंपनियों ने कोरोना कवर देने से मना किया | जब विरोध प्रदर्शन हुए तब दिया |
सोचिए अब आप ! काम करने के बाद हक के पैसे पूरे नहीं मिलते , जो मिलते हैं उसमें भी काट लिए जाते हैं ! मध्य वर्ग का इंसान जाए तो कहाँ जाए , करे तो क्या करे ?
इतना होने के बाद भी मीडिया और सरकार और सब को अकेले उन ‘कथित; ग़रीब मजदूरों का दुख ही दिखता है !
चलो मजदूरों की सहयता के लिए तमाम एनजीओ खड़े हो जाएँगे कम्युनिस्ट पॉलिटिकल पार्टी खड़े हो जाएँगे |
मीडिया इनकी आवाज़ बन जाएगा , मगर मध्य वर्ग !
कौन है उसका पैरवी करने वाला ? उसे तो अपनी लड़ाई , खुद ही लड़नी है ! कोई नहीं है उसका पक्षकार !
मजदूर को उसकी मज़दूरी के पैसे कम दे कर देखिए , सात पुश्तों को याद करेगा आपकी ! होली दीवाली पर बोनस देर से दे कर देखिए ! या तो फिर अधिक देर तक कम करने को कहिए ! वह चाहे काम करे न करे मज़दूरी आपको पूरी देनी होगी !
ठेकेदार भी नहीं पड़ेगा बीच में , और यदि काम के डोआरन हादसा हो गया तो ज़िम्मेदारी आपकी !
मध्य वर्ग की हालत सैंड विच के चटनी जैसी हुई है जो ब्रेड के दोनो स्लाइस का स्वाद बढ़ाती है , मगर बेचारी खुद पिस जाती है !