अपनी बात कहने से पहले, मैं एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ :
मेरे एक परिचित हैं। उनकी अपनी एक दुकान, बेहद महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है।
दुकान के सामने उन्होंने एक काम चलाऊ छत बनाई और वह जगह, जो वास्तव में नगरपालिका की थी, भी अपने परिचित को किराये पर दे दी।
किरायेदार ने जगह की जरूरत को ध्यान में रखते हुए चाय और फलों का जूस बेचना शुरू कर दिया। जगह का मासिक किराया ढाई हजार रुपये था।
इस सब के अलावा शाम को घर की तरफ चलते समय थैली में करीब आधा लिटर जूस लेकर जाते थे, जिसका कभी कोई पैसा नहीं दिया। उन्हें कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह फ्री का जूस घर ले जाने में कोई नैतिकता की गाँठ गले में अटक रही है।
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अब अपनी बात कहूँगा :
एक परिवार में, माता पिता की जो औलाद पैदा होती है (बेटा हो या बेटी) उसकी चार अलग-अलग कैटिगरी हैं :
(1) पिछले जन्म का दुश्मन है, जिसने बेटे के रूप में जन्म लिया है। अब अपना बदला लेगा।
(2) पिछले जन्म का कर्जदार है, जिसने बेटे के रूप में जन्म लिया है। अब अपना पैसा (मय ब्याज के) वसूल करेगा।
(3) यह तटस्थ है। बड़ा होकर, पढ़ लिख कर शादी ब्याह के बाद घर छोड़कर चला जायेगा और फिर कभी वापस नहीं आयेगा।
(4) माता पिता का सेवक है। उनके आखिरी साँस तक, हर प्रकार से उनकी सेवा करेगा।
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तो सवाल पूछते समय, जिस बेटे का बिम्ब आपके दिमाग में बना हुआ है :वह आया ही अपना कर्ज वसूलने के लिए। इसलिए उसे छोटा मोटा काम करने की कोई आवश्यकता नहीं है। काम करेंगें उसके पिता जी, वो तो इस दुनिया में आया ही अपने बाप के पैसे पर ऐश लेने के लिए।।
इसलिए एक बेहद प्रचलित देहाती कहावत है :
जिसका उधार लिया है, हाथ जोड़कर दे दो। नहीं तो, अगले जन्म में (मय ब्याज के) बाह बाह कर देना पड़ेगा।
यह कहावत क्योँकि खेती की दुनिया से जुड़ी हुई हैं,
” बाह बाह कर देना पड़ेगा “
से अभिप्राय है :
बैल बनकर हल खींचना पड़ेगा, (परन्तु कर्ज की तो दमड़ी दमड़ी चुकानी ही पड़ती है) ।।