बिहार से सबसे ज्यादा नेता पैदा होते हैं। बिहार के दूसरे राज्यों में मजदूरी करने वाले लोगों से भी बात कीजिए तो ऐसे हांकेगे जैसे पूरा यूएनओ उन्हीं के इशारे पर चलता है। बिहार वाली ट्रेन में यात्रा कीजिए…….हर कोई, गांधी, चर्चिल, स्टालिन, माऊ और नेहरु होता है।
बिहार के लोगों के लिए विकास से ज्यादा उनकी जाति महत्वपूर्ण है। बिहार एक दलित और पिछड़ा बहुल राज्य है और वहां के लोगों में 90 के दशक में ऐसी भावना कूट-कूट कर भरी गई कि जो वहां के 12% तथाकथित अगड़ी जाति के लोगों को गाली देगा, वही अच्छा नेता कहलाएगा। पिछड़े वर्गों का जो नेता सबको साथ लेकर चलने की कोशिश करता है उसे सामंतों का एजेंट बता दिया जाता है या कहा जाने लगता है कि कि इसका किसी अगडी जाति के नेता के बहन या बेटी के साथ अवैध संबंध है।
पहले 15 साल तक लालू यादव ने अगड़ों को गाली देकर राज किया और जंगलराज कायम कर दिया तो पिछले 15 साल से नीतीश कुमार ने कभी लालू यादव का डर दिखाकर बिहार पर राज किया तो कभी लालू को ही यह डर दिखाकर उसी की मदद से बिहार पर शासन किया की उसने अगर नीतीश कुमार का समर्थन नहीं किया तो अगड़ी जाति के लोग फिर से सत्ता में आ जाएंगे।
नीतीश कुमार का एक कथन बड़ा मशहूर है, “चांद पर भी वैकेंसी होगी तो बिहारी वहां पहुंच जाएंगे।” नीतीश के समर्थक अपने नेता से क्यों नहीं पूछते कि बिहार में ही अपनी वैकेंसी पैदा करो कि हमें अपने घर के पिछवाड़े में ही काम मिल जाए। बिहार का जो युवा संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करता है वह गैंगमैन और ट्रैक मैन के पदों के लिए भी उतनी ही शिद्दत से तैयारी करता है। बहुत सारे युवा नौकरी की उम्र निकल जाने पर नाम और पता परिवर्तित करके फिर से बोर्ड की परीक्षा दे देते हैं। आईआईटी पास करने वाला भी चौथे दर्जे सरकारी नौकरी चाहता है, उसे निजी क्षेत्र या स्वरोजगार पसंद नहीं।
मैंने बिहार के बहुत सारे पिछड़ी जाति या दलित जाति के ऐसे मित्रों से जो प्राइवेट सेक्टर में अच्छे पदों पर तैनात हैं, बैंक में अधिकारी है या विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है, से सुना है कि लालू ने ही उनको आवाज दी है और लालू और उसके परिवार ने किस प्रकार बिहार के तथाकथित ऊंची जाति के लोगों को बर्बाद किया, उनके बच्चों का अपहरण किया, उनके परिवार की महिलाओं की इज्जत लूटी, उनके काम धंधे को बर्बाद किया। उनमें से बहुत सारे लोग पूरे गर्व से बताते हैं कि किस प्रकार पिछड़े नेताओं के संरक्षण में माओवादी उग्रवादियों ने बड़े पैमाने पर भूमिहार ब्राह्मण , राजपूत, और कायस्थ जैसी ऊंची जाति के लोगों का सफाया किया। मेरे एक यादव मित्र दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने एक बार पूरी शान से मुझे किस्सा सुनाया कि कैसे लालू यादव के साले साधु यादव ने पटना के मशहूर कमला स्टोर के मालिक की बेटी शिल्पी जैन को अपने दोस्तों के साथ जी भर कर पे.. और फिर उसे उसके ब्वॉयफ्रेंड के साथ मार कर उसी की गाड़ी में डाल दिया। मेरे एक दलित मित्र ने पूरे गर्व से मुझे बताया कि कैसे उनके राज्य के एक बड़े दलित नेता रामविलास पासवान ने एक ब्राह्मण महिला को अपनी दूसरी पत्नी बना कर रखा हुआ है। यह दलित मित्र पूरे गर्व से बताते हैं कि उनकी जाति के लोग तो ब्राह्मण महिलाओं को अपनी दूसरी बीवी बनाकर रखते हैं।
बिहार के लोग अक्सर यह जानने में दिलचस्पी रखते हैं कि उनके जिले का जो डीएम है वह किस जाति का है, एसपी किस जाति का है, डिस्ट्रिक्ट जज किस जाति का है? फिर आ जाते हैं कि उनके ब्लॉक का बी डी ओ और सी ओ किस जाति का है, थानाध्यक्ष किस जाति का है, यहां तक कि उनके गांव का राजस्व कर्मचारी और ग्राम सचिव किस जाति का है, गांव के स्कूल के हेड मास्टर और मास्टर किस जाति के हैं? हम लोगों ने देखा कि बिहार के सवर्णों को इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि उनका काम किस जाति का कर्मचारी करेगा, उनको अपना काम निकालने से मतलब होता है। लेकिन यह सच्चाई है कि पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों में इस बात की बहुत चिंता होती है कि सरकार के पदों पर उनके अपने आदमी है कि नहीं। फिर उनके नेताओं द्वारा लड़ाई होती है कि किस जगह में पिछड़े कम है, किस जगह दलित कम है। अगर सामान्य जाति का कोई बड़ा अधिकारी अच्छी पोस्टिंग पा जाता है तो बिहार के सामाजिक न्याय के समर्थक कहने लगते हैं कि वह अधिकारी अपनी कार्य क्षमता और उपयोगिता के कारण नहीं बल्कि उसके बहन, बेटी, बीबी का अवैध संबंध फलाना फलाना बड़े नेता के साथ……इसीलिए इसको ऐसे मलाईदार पोस्टिंग मिली। अब जिस समाज के प्रबुद्ध लोग ही इस प्रकार की भयंकर सोच रखते हैं वहां एक सीमा से अधिक विकास नहीं हो सकता। विकास नहीं होगा तो मजदूरी करने दूसरे राज्यों में जाएंगे ही। दूसरे प्रांतों के लोग भी अन्य प्रांतों में रोजगार प्राप्त करने जाते हैं इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन आप पूरी तरीके से दूसरों के यहां चले जाएं तो समस्या कभी ना कभी आपके पीछे आएगी ही।
बिहार के लोगों में अक्सर एक बात देखी जाती है कि वह हमेशा अनजान व्यक्ति से सबसे पहले उसकी जाति जानने की कोशिश करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि बिहार के सभी दलित और पिछड़ी जाति के लोगों की सोच नकारात्मक ही है लेकिन ऐसा लगता है कि जब उन्हें नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुनना होता है तो वह सांप नाथ को चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सांपनाथ कम जहरीला है।