मुहम्मद अली जिन्ना एक शिया मुसलमान थे। पढ़े लिखे औसत दर्जे के वकील थे जो पचास रूपये की नौकरी करना चाहते थे। उन्हें कोई तीस रूपये प्रति महीने से अधिक तनख्वाह नहीं मिली तो राजनीति में मुहरा बन गये। मुस्लिम श्रेष्ठता के तलबगार नवाबों और इस्लामिक कठमुल्लों की साजिश की विसात पर एक कमजोर लंगड़े टीबी मरीज प्यादे को मुखौटा बनाया गया। यह प्यादा खुद इस्लाम की रूढ़िवादिता का प्रबल विरोधी था। जिसे मुसलमानों के रीतिरिवाजों रहनसहन परंपराओं पहनावों से सख्त चिढ़ थी। शराब के शौकीन, हमेशा तीन पीस सूट पहने व्यक्ति में हीन भावना इतनी कूटकर भरी हुई थी कि उसे किसी आम मुसलमान के साथ खड़े होने में भी शर्म महसूस होती थी। इस गुलाम मानसिकता के किरदार में दबे कुचले पराजित गुलाम का भाव अधिक था किसी शुद्ध आदर्श राजनैतिक विचारधारा का वहाँ कोई स्थान नही था।मौलाना महमदी की इस्लामिक विचारधारा अल्लामा इकबाल की अधकचरी राजनैतिक सूझबूझ और स्वार्थी लालची बेरहम अंग्रेजों की सियासी चालों की सामूहिक उत्पत्ति थे जिन्ना। धर्मनिरपेक्ष थे या नहीं ,क्या फर्क पड़ता है? व्यक्तिगत तौर मैं समझता हूँ कि जिन्ना को इस बात का अहसास था कि धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान आधुनिक विश्व की आवश्यकता है। लेकिन इस बात को समझाने की क्षमता एक कमजोर मस्तिष्क और जर्जर मरते 29 किलो के शरीर में नहीं थी।मेरा खयाल है कि अगर मुहम्मद अली जिन्ना 1960 तक जिन्दा होते तो खुद भागकर वापस आते और अपने परिवार के साथ मुम्बई में रहते। उनके खुद के परिवार का कोई सदस्य पाकिस्तान की अवधारणा का समर्थक नहीं था। अंत में मेरा जवाब मुहम्मद अली जिन्ना का धर्म से कोई लेना देना नहीं था तथापि उनकी धर्मनिरपेक्षता कभी कसौटी पर खरी नहीं उतरी। 1946 डायरेक्ट ऐक्शन प्लान की रोशनी में जिन्ना के चेहरे पर पुती साम्प्रदायिक कालिख स्थाई रूप से इतिहास में सुरक्षित हो गई है।